मुझे कुछ अफ़सोस नहीं के मेरे पास सब कुछ होना चाहिए था ।
मै उस वक़्त भी मुस्कुराता था जब मुझे रोना चाहिए था ।
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एक तुम भी ना कितनी जल्दी सो जाते हो,
लगता है इश्क को तुम्हारा पता देना पड़ेगा..
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इसलिए भी खामोश रहने लगा हूँ मैं,

क्योंकी उस पर मेरी बात का अब असर नहीं होता..
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शिकवा तो यूँ करते हो जैसे बस मेरे ही हो तुम,

कभी खुद से पूछो मेरी बरबादियों का सबब क्या था।
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मुझको समझाया ना करो अब तो हो चुकी,
मुहब्बत मशवरा होती तो तुमसे पूछ के करते..
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वह कितना मेहरबान था, कि हज़ारों गम दे गया..
हम कितने खुदगर्ज़ निकले, कुछ ना दे सके उसे प्यार के सिवा।
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हर ज़ुल्म तेरा याद है भूला तो नहीं हूँ,

ऐ वादा फरामोश मैं तुझ सा तो नहीं हूँ..
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इस दिल को तो बहला कर चुप करा लूँगा
पर इस दिमाग का क्या करूँ जिसका तुमनें दही कर दिया है..
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