कभी आवाज में कशिश थी कभी नजरो में नशा था,
फिर जो तेरा असर होने लगा होश मै खोने लगा
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एहसास तो उसको भी बहुत है मेरी मुहब्बत का,
वो तड़पती इसलिए है की मैं और भी टूट के चाहूं उसे..
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झुठ बोलकर तो मैं भी दरिया पार कर जाता,

मगर डूबो दिया मुझे सच बोलने की आदत ने..
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तलब मौत की करना गुनाह है ज़माने में यारो,

मरने का शौक है तो मुहब्बत क्यों नहीं करते..
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बहुत जुदा है औरोँ से मेरे दर्द की कहानीँ,

जख्म का कोई निशाँ नहीँ और दर्द की कोई इँतहा नहीँ..
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दिल के रिश्तों कि नज़ाक़त वो क्या जाने फ़राज़
नर्म लफ़्ज़ों से भी लग जाती हैं चोटें अक्सर
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कभी पिघलेंगे पत्थर भी मोहब्बत की तपिश पाकर,

बस यही सोच कर हम पत्थर से दिल लगा बैठे ।
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मैं यह नहीं कहता के मेरी खबर पूछो तुम..
खुद किस हाल में हो इतना तो बता दिया करो..
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