मैं कहाँ से लाऊ...बता मिलता कहा है वो नसीब,
जो उमर भर के लिए तुझे मेरा कर दे
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देख कर चाँद को समँदर भी हिल जाता है,
उन पर क्या गुज़रती होगी जिनकी बाँहों में चाँद होता है
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अगर तू वजह ना पूछे तो एक बात कहूँ,
बिन तेरे अब हमसे जिया नहीं जाता !
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नज़र नज़र का फर्क है, हुस्न का नहीं,
महबूब जिसका भी हो बेमिसाल होता है
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तमाम शराबें पी ली थी इस जहाँ की मगर,
उसकी आँखों में झाँका तो जाना आखिर नशा भी क्या चीज़ है
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अगर ये झूठ है की तुम मेरे हो,
तो यकीन मानो सच मेरे लिए कोई मायने नहीं रखता !!
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अपनी ईन नशीली निगाहों को जरा झुका दीजिए जनाब,
मेरे मजहब में नशा हराम है
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एक बार तुम गले लगाने की मुझे इज़ाजत तो दो,
सारी शिकायते तेरे काँधे से होकर गुज़र जाएगी !!
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