शाम से आँख में नमी सी है
आज फिर आप की कमी सी है
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खुदा के घर से चंद फरिश्ते फरार हो गये;
कुछ पकड़े गये कुछ हमारे यार हो गये!
.
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जो तूफ़ानों में पलते है,
वही दुनिया बदलते हैं !
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तेरी मुहब्बत भी किराये के घर की तरह थी ..
कितना भी सजाया .. पर मेरी नहीं हुई .. !!
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राज़ किसी को ना बताओ , तो इक बात कहूँ ..
हम रफ्ता-रफ्ता तेरे होते जा रहे हैं .. !!
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वो रोई तो जरूर होगी खाली कागज़ देखकर ..
ज़िन्दगी कैसी बीत रही है पूछा था उसने ख़त में .. !!
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मिल जायेंगा हमें भी कोई टूट के चाहने
वाला ..
अब शहर का शहर तो , बेवफा नहीं हो सकता.. !!
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जिसे पूजा था हमने वो खुदा तो न बन सका ..

हम ईबादत करते करते , फकीर हो गए .. !!
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