जो देखता हूँ वही बोलने का आदी हूँ
मैं अपने शहर का सब से बड़ा फ़सादी हूँ..!
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सुलगती रेत में पानी की अब तलाश नहीं,
मगर ये मैंने कब कहा के मुझे प्यास नहीं..!
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मेरी_आँखो ने पकड़ा है, उन्हे कई बार रंगे_हाथ,

वो_इश्क करना तो चाहते है , मगर घबराते बहुत है
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शिकायतें शोर मचाती है बहुत,
प्यार की आवाज़ अब ठीक से सुनाई नहीं देती..!
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तेरी पहचान भी न खो जाए कहीं

इतने चेहरे ना बदल थोड़ी सी शोहरत के लिए..!
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सिर्फ महसूस किये जाते हैं,
एहसास दोस्ती के कभी लिखे नहीं जाते..!
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रहने दे कुछ बातें यूँ ही अनकही-सी,
कुछ जवाब तेरी-मेरी खामोशी में अटके ही अच्छे हैं..!
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उड़ा देती है नींदे कुछ ज़िम्मेदारियां घर की..
रात मे जागने वाला हर शख्स आशिक़ नही होता..!
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